शुक्रवार, 19 मार्च 2021

महाकाली साधना

{{{ॐ}}} 

                                                  ।#शाबर_महाकाली_साधना
            
माँ काली साधना कल्पवृक्ष के समान है जेसे कल्पवृक्ष के नीचे खड़े होने मात्र से ही समस्त कल्पना सिद्ध होने लगती हे इसीप्रकार माँ काली की साधना सिर्फ शुरू करने मात्र से ही सभी मनोरथ सिद्ध होने लगते हे
मंत्र सिद्ध है फिर भी मन मे ऐसा कुछ ना आये के मुझे अनुभव कैसे मिलेगा इसलिये किसी भी मंगलवार के दिन शाम को ९:३०से १०:३० के समय मे मंत्र का १०८ बार जाप कर लिजिये और २१ आहुती घी का दे साथ मे एक नींबू मंत्र का जाप करके चाकू से काटे तो बलि विधान भी पूर्ण हो जायेगा,नींबू को हवन कुंड मे डालना ना भूले.

अब जब भी आपको अपनी मनोकामना पूर्ण करने हेतु विधान करना हो तब जमीन पर थोडासा कुछ बुंद जल डाले और हाथ से जमीन को पौछ लिजिये.
साफ़ जमीन पर कपूर कि टिकिया रखे और मन ही मन अपनी कामना बोलिये.अब तीन बार "ओम नम: शिवाय" बोलकर कपूर जलाये और माहाकाली मंत्र का जाप करे,यहा पर मंत्र जाप संख्या का गिनती नही करना है और जाप करते समय ध्यान कपूर के ज्योत मे होना चाहिये इसलिये मंत्र भी पहिले ही याद करना जरुरी है.

कम से कम ४-५टिकिया कपूर का इस्तेमाल करे और कपूर इस क्रिया मे बुझना नही चाहिये जब तक आपका जाप पूर्ण ना हो और इतने समय तक जाप करे अन्दाज से के आपका २१ बार मंत्र जाप होना चाहिये.अब आप ही सोचिये आपको रोज कितना कपूर जलाना है.

साधना तब तक करना है जब तक आपका इच्छा पूर्ण ना हो और इच्छा पूर्ण होने
के बाद कुछ गरिब बच्चो मे कुछ मिठाई बाटे क्योकि इच्छा पूर्ण होने के खुशी मे..

मंत्र-

ll ओम नमो आदेश माता-पिता-गुरू को l आदेश कालिका माता को,धरती माता-आकाश पिता को l ज्योत पर ज्योत चढाऊ ज्योत कालिका माता को,मन की इच्छा पुरन कर,सिद्धी कारका l दुहाई माहादेव कि ll

मंत्र सिद्ध है शाबर महाकाली साधना. के करने मात्र से ही आपकी समस्त इच्छाएं पूर्ण होने लगती हे आपकी हर और से उन्नति होकर सभी बाधाएं समाप्त हो जाती है
                                                             भात पढना 
 इस नीचे लिखे मंत्र को भात मे पढै उस भात के खाने से अपदेवता दास होजाते है।  
 #मंत्र-भात बाज्दम भात वाडम भाते डेम पानि एभाते ऊपरे ठैसे चोंसठि योगिनी ॐ कुल हते डाकिनी डाके अमुकारे भात पडिया देम मोर नफर हइया थाके श्री श्री श्री सिध्दि गुरूवे पाओ कामरूप कामाख्या माओ एकनाने करे शास्त्रपाने भरे श्रीखोराजर आज्ञा रक्षाकरे डाकिनी।

आचार्य मनोज तिवारी
सहसेपुर खमरिया भदोही
9005618107

विवाह में देरी हो रही हों तो करें यह उपाय

।।ॐ क्रीं कालिकायै नमः।।
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हर हर महादेव शिव शम्भू
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किसी भी अमावश्या के दिन आप एक नारियल लीजिये नारियल आपको पानी वाला लेना है।
अमावश्या की रात काली रात होती है।

शुक्ल पक्ष का अंतिम दिवस हो गया पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष का आख़िरी दिन हो गया अमावश्या ।
तो आपको अमावश्या के दिन एक नारियल पानी वाला लेना है।

उस नारियल में छेद करना है नारियल में छेद करने के बाद आप उसमे पांच प्रकार की छोटी छोटी लकड़ी डाल दें।

जैसे आम की लकड़ी पीपल की लकड़ी बरगद की लकड़ी अमरूद की लकड़ी और बेल या बेर की डाल सकते हैं।
इसी में छोटा सा पत्ता पत्ते का एक टुकड़ा केले के पेड़ का भी डाल दीजिए।

अब आप एक लाल रंग के कागज लीजिये और उस कागज पर पीले रंग के स्याही से यदि यह प्रयोग कोई लड़की कोई स्त्री कर रही है।

तब वह लिखेगी मनवांछित वर देहि में।।
और अगर यह उपाय कोई पुरुष कर रहा तो वह लिखेगा मनवांछित भार्या देहि में।।

अब इस पर्ची को जिसे आप ने अभी लिखा उसे भी मोड़कर फोल्ड कर उसी छेद में जिसपर आपने पांच लकड़ी अभी डाली उसी में इसको भी डाल दीजिए।

अब आप थोड़े से बेसन लीजिये बेसन मतलब चने की आटा थोड़ा सा लेना है।
उसमे पानी डालकर उसे आटे को गूथिये उसी प्रकार जिस प्रकार गेहूं के आटे से रोटी बनाते समय गुथा जाता है।

फिर उसी से आप नारियल के इस छेद को बंद कर दीजिए जिसे आपने किया था।
इसे इस नारियल को अब उसी दिन अमावश्या के ही दिन किसी बहते हुए नदी नहर यानी जंहा पानी बहता रहता हो रुका न हो वही आप इस नारियल को विषर्जित कर दीजिए।
इस प्रयोग को आपको सुबह 7 बजे से लेकर शाम 7 बजे के बीच पूर्ण कर लेना है।

बहुत कोशिशों के बाद लड़की की विवाह न हो रही हो अच्छे रिश्ते न मिल रहे हो मनमुताबिक योग्य रिश्ते न मिल रहे हों।

लड़की के मां बाप अब हार मान कर घर बैठ गए हो निराश व नराज हो चुके हो।
इसी प्रकार लड़के को भी कोई योग्य सुशील मनवांछित वधु भार्या या पत्नी न मिल रही हो।

लड़के का उम्र अब निकलने लगा है माँ बाप रिस्तेदार हताश हो कर बैठ गए हो।

लड़की और लड़के के मां बाप उनके घर वाले अब तो यंहा तक सोच लिए की शायद हमारे बच्चे बच्चियों की जोड़ी उस ईश्वर ने बनाना ही भूल गए हैं।

ऐसे हताश निराश व नाराज लोग इस उपाय को इस प्रयोग को लगातार पांच अमावश्या पूर्ण श्रद्धा विश्वास और संकल्प के साथ पूर्ण करें।

पांच बार प्रयोग पूर्ण भी नही हुआ रहेगा और आप देखेंगे आप को आपके मनवांछित वर या वधु पत्नी पति आप को मिल चुके हैं।

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आचार्य मनोज तिवारी
सहसेपुर खमरिया भदोही
9005618107

निंबू से बदलें भाग्य

जय माँ आदिशक्ति
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आज बताते हैं नीबू के कुछ चमत्कारी प्रयोग इसका तंत्र में प्रयोग विभिन्न प्रकार के समस्याओं में इस नीबू का उपयोग जिसे आप खुद करके लाभ ले सकते हैं।
सदियों से नीबू का प्रयोग कई कई तांत्रिक अभिकर्म टोने टोटको में होता आया है।
यह वानस्पतिक तंत्र के अंतर्गत भी आते हैं।
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1) यदि आप या आपके परिवार में कोई हमेशा अस्वस्थ रहते हो बीमार रहते हों उनको दवा भी नही लग रही तब आप को किसी भी मंगलवार को एक नीबू लेना है।

उसी दिन सन्ध्या गोधूलि बेला के वक्त आप उस नीबू को लेकर पश्चिम दिशा की तरफ मुँह करके खड़े हो जाएं और आपको तीन बार बोलना है।।ॐ ब्रम्ह ब्रम्ह मंडले नमो नमः।।

उसके बाद उस नीबू को अपने सर से या रोगी के सर से तीन बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में तीन बार घुमाना है। 
नीबू को सर पर से घुमाने के बाद वही उसे जमीन पर रखकर एक ही बार मे काट लेना है एक ही बार मे नीबू दो टुकड़े हो जाने चाहिए।

फिर उस कटे नीबू के एक टुकड़े को अपने सामने की ओर और एक टुकड़े को अपने पीछे की ओर फेक देना है।
ऐसा लगातार तीन मंगलवार तक करना है फिर इसका रिजल्ट परिणाम आप खुद देखेंगे।

2) जिनके जिन मां बाप के बच्चे उनका कहना न मान रहे हो मनमानी करते फिरते हो तब आप जब भी बच्चे को खाना देते हों।
आप अपने बच्चे को जब थाली में खाना खाने को परोसते हो उस वक्त उनके थाली के नीचे नीबू के पांच बीज रख दें
यह प्रयोग आप किसी भी गुरुवार को करें।

और जब बच्चा खाना खा कर उठ जाए तब उस नीबू के बीज को वहां से उठा कर किसी केले के पेड़ नीचे दबा दें और दबा कर यह बोलना है।
हे गुरुदेव आप मेरे बच्चे के अंदर अच्छे अच्छे गुण भर दें उसके अंदर सदाचार और सद्भावना विकसित करें।

ऐसा आपको तीन गुरुवार लगातार करना है फिर आप देखेंगे इस प्रयोग का असर।।।।

3) यदि आपको कोई अनजाने भय सताते हो बुरे सपने यदि आपको अक्सर आते हो आपका मन अशांत रहता हो तब आप किसी पूर्णमासी के दिन रात दस बजे अपने बेडरूम में यह प्रयोग करें।

आप रात दस बजे एक हरा नीबू ले साथ ही पांच इलायची छोटी व पांच कपूर ले अब कपूर व इलायची को एक साफ सुथरी कटोरी में रसखकर जला ले।

उसे जलाने के बाद नीबू अपने सर से पैर तक साथ बार उतारा करे फिर नीबू को काट कर उसी जली हुई कपूर इलायची में पूरा निचोड़ दें।

और इन सब को ले जाकर किसी चौराहे पर फेंक आये इस प्रयोग को आपको सिर्फ एक ही बार करना है।

4) जिन मां बाप के बच्चों की पढ़ाई में मन न लगते हो एकाग्रता की उनमे बहुत कमी देखने को मिलते हो तो ऐसे में यह प्रयोग आपको करना है।

किसी भी सोमवार को आपको एक नीबू लेना है उस नीबू को काटकर एक कटोरी में निचोड़ लेना है फिर एक छोटा टुकड़ा कपड़े का उस नीबू के रस से भिगो लेना है।

कपड़े भिगो लेने के बाद उसे धूप में सुखा लेना है उसे धूप में सुखा लेने के बाद थोड़ी सी सरसो के तेल में उसे डुबाकर डीप कर लेना है।

और उसे बाती बना लेना बाती बनाकर उस बच्चे के सर पर से पांच बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा घुमाकर फिर उस बाती को घर पर ही किसी कोने में जला दें।

उस बाती के जले हुए राख को रात को किसी चौराहे पर ही जाकर फेक आना फिर देखना इस प्रयोग का कैसा ।।मन जबरदस्त परिणाम आपको दिखने को मिलेगा।।

5) बहुत से लोगों का यह कहना होता है कि किसी ने हमपर कुछ करा रखा है हमपर जरूर किया कराया हुआ है हमपर जादू टोने मैली विद्या का प्रयोग किया गया है।

जिन पर तंत्र मंत्र की बाधा हो किये कराए हो जिन पर अमल काला जादू कर दिया गया हो वे लोग इस उपाय को करें।

किसी भी मंगलवार के दिन ब्रम्हमुहूर्त में एक नीबू ले कर हनुमान जी के मंदिर में जाना है ।
मन्दिर में जाकर उस नीबू से हनुमान जी का सात बार उतारा करना नीबू फेरना है उनका उतारा करना है।

उतारा करते वक्त हनुमान जी से अपनी समस्याएं मन ही मन बोल दे।
फिर आप उस नीबू को ले कर पूरे मन्दिर की पांच परिक्रमा करें ।

फिर मन्दिर के पिछवाड़े खड़े हो अपने पर ऊपर से नीचे सात बार उतारा करें फिर नीबू को काटकर उस पर दो कपूर जला कर सीधे घर आ जाएं।

यह प्रयोग भी एक ही बार करें और आप इसका असर आप प्रत्यक्ष देख पाएंगे।

नीबू के और भी बहुत ज्यादा चमत्कारी प्रयोग हैं हमारे अगली पोस्ट में हम उन प्रयोगों से आपको अवगत कराते जाएंगे अभी के लिए आज बस इतना ही।

।।धन्यवाद।।
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आचार्य मनोज तिवारी 
सहसेपुर खमरिया भदोही
9005618107

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

🚩🌺पेड पौधों से बदले अपना भाग्य🌺🚩

इन पौधों की जड़ से बदल जाएगी आपकी किस्मत, जानिए कैसे...


आयुर्वेद के अलावा भारत की स्थानीय संस्कृति में कई चमत्कारिक पौधों के बारे में पढ़ने और सुनने को मिलता है। कहते हैं कि एक ऐसी जड़ी है जिसको खाने से जब तक उसका असर रहता है, तब तक व्यक्ति गायब रहता है। एक ऐसी भी जड़ी-बूटी है जिसका सेवन करने से व्यक्ति को भूत-भविष्‍य का ज्ञान हो जाता है। कुछ ऐसे भी पौधे हैं जिनके बल पर स्वर्ण बनाया जा सकता है। इसी तरह कहा जाता है कि धन देने वाला पौधा जिनके भी पास है, वे धनवान ही नहीं बन सकते बल्कि वे कई तरह की चमत्कारिक सिद्धियां भी प्राप्त कर सकते हैं।

क्या सचमुच होते हैं इस तरह के पौधे व जड़ी-बूटियां जिनको घर या आंगन में लगाने से आपके बुरे दिन समाप्त और अच्छे दिन शुरू हो सकते हैं? कई शास्त्रों में यह पढ़ने को मिलता है कि जड़ी-बूटियों के माध्यम से धन, यश, कीर्ति, सम्मान आदि सभी कुछ पाया जा सकता है। हो सकता है कि आपके आसपास ही हो इसी तरह की जड़ी बूटियां। यदि आप इन्हें घर में ले आएं तो आपको हर तरह की सुख और सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं।

दरअसल, हम आपको बता रहे हैं ऐसे पौधों की जड़ों के बारे में जिनके प्रयोग से आपकी किस्मत बदल सकते हैं। हालांकि यह जड़े किसी जानकार से पूछकर ही घर में लाएं। यहां जो जानकारी दी जा रही है वह भिन्न भिन्न स्रोत से एकत्रित की गई है। हालांकि इसमें कितनी सचाई है यह बताना मुश्किल है। अगले पन्ने पर जानिये इन जड़ों के बारे में...


* बहेड़ा की जड़:- पुष्य नक्षत्र में बहेड़ा वृक्ष की जड़ तथा उसका एक पत्ता लाकर पैसे रखने वाले स्थान पर रख लें। इस प्रयोग से घर में कभी भी दरिद्रता नहीं रहेगी। इसके अलावा पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में बेहड़े का पत्ता लाकर घर में रखें, घर पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त रहेगा।

*मंगल्य : मंगल्य नामक जड़ी भी तांत्रिक क्रियानाशक होती है। 

 

* धतूरे की जड़:- धतूरे की जड़ के कई तां‍त्रिक प्रयोग किए जाते हैं। इसे अपने घर में स्थापित करके महाकाली का पूजन कर 'क्रीं' बीज का जाप किया जाए तो धन सबंधी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।  

* धतूरे की जड़ : अश्लेषा नक्षत्र में धतूरे की जड़ लाकर घर में रखें, घर में सर्प नहीं आएगा और आएगा भी तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

* काले धतूरे की जड़:- इसका पौधा सामान्य धतूरे जैसा ही होता है, हां इसके फूल अवश्य सफेद की जगह गहरे बैंगनी रंग के होते हैं तथा पत्तियों में भी कालापन होता है। इसकी जड़ को रविवार, मंगलवार या किसी भी शुभ नक्षत्र में घर में लाकर रखने से घर में ऊपरी हवा का असर नहीं होता, सुख -चैन बना रहता है तथा धन की वृद्धि होती है।


* मदार की जड़:- रविपुष्प नक्षत्र में लाई गई मदार की जड़ को दाहिने हाथ में धारण करने से आर्थिक समृधि में वृद्धि होती हैं।

* मदार की जड़:- रविपुष्प में उसकी मदार की जड़ को बंध्या स्त्री भी कमर में बंधे तो संतान होगी।

* मदार की जड़:- कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय हेतु आर्द्रा नक्षत्र में आक की जड़ लाकर तावीज की तरह गले में बांधें।

* हत्था जोड़ी:- हत्था जोड़ी का मुकदमा, शत्रु संघर्ष, दरिद्रता आदि के निवारण में इसका प्रयोग किया जाता है। तांत्रिक विधि में इसके वशीकरण के उपयोग किए जाते हैं। सिद्ध करने के बाद इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान में अथवा तिजोरी में रख दिया जाता है। इससे आय में वृद्घि होती है और सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिलती है।

 

* बेला की जड़:-विवाह की समस्या दूर करने के लिए बेला के फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसकी एक और जाति है जिसको मोगरा या मोतिया कहते हैं। बेला के फूल सफेद रंग के होते हैं। मोतिया के फूल मोती के समान गोल होते हैं। महिला को गुरु की जड़ और पुरुष को शुक्र की जड़ अपने पास रखनी चाहिए।

 

* चमेली की जड़:- अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ गले में बांधें, शत्रु भी मित्र हो जाएंगे। विष्णुकांता का पौधा भी शत्रुनाशक होता है।

* चंपा की जड़:- हस्त नक्षत्र में चंपा की जड़ लाकर बच्चे के गले में बांधें। इस उपाय से बच्चे की प्रेत बाधा तथा नजर दोष से रक्षा होगी।

* शंखपुष्पी की जड़:- शंखपुष्पी की जड़ रवि-पुष्य नक्षत्र में लाकर इसे चांदी की डिब्बी में रख कर घर की तिरोरी में रख लें। यह धन और समृद्धि दायक है।

* तुलसी की जड़:- पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में तुलसी की जड़ लाकर मस्तिष्क पर धारण करें। इससे अग्निभय से मुक्ति मिलेगी।

* दूधी की जड़:- सुख की प्राप्ति के लिए पुनर्वसु नक्षत्र में दूधी की जड़ लाकर शरीर में लगाएं।

* नीबू की जड़:- उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीबू की जड़ लाकर उसे गाय के दूध में मिलाकर निःसंतान स्त्री को पिलाएं। इस प्रयोग से उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।

* काले एरंड की जड़:- श्रवण नक्षत्र में एरंड की जड़ लाकर निःसंतान स्त्री के गले में बांधें। इस प्रयोग से उसे संतान की प्राप्ति होगी।

* लटजीरा:- लटजीरा की जड़ को जलाकर भस्म बना लें। उसे दूध  के साथ पीने से संतानोत्पति की क्षमता आ जाती हैं। 


* अपामार्ग के प्रयोग : अपामार्ग बाजीकरण के काम में आती है। इसके भी कई प्रयोग हैं। एक प्रयोग यह है कि अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे।

* संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर ताबीज में जड़ दे और इसे गले में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आ

पसे आकर्षित होने लगेंगे।

 

*उटकटारी:- यदि आप राजनीति के क्षेत्र में तरक्की करना चाहते हैं तो यह जड़ी राजयोग दाता है। इस पौधे को बहुत से लोगों ने देखा होगा। इसके प्रभाव से व्यक्ति के भाग्य में वृद्धि होती है। लेकिन इस पौधे को विधिपूर्वक लाकर पूजा करना होती है।

 

*रक्तगुंजा की जड़:- रक्तगुंजा को लगभग सभी लोग जानते होंगे। इसे रत्ती भी कहते हैं क्योंकि इसका वजन एक रत्ती के बराबर होता है और किसी समय इससे सोने की तौल की जाती थी। इस पौधे की जड़ रवि पुष्य के दिन, किसी भी शुक्रवार को अथवा पूर्णिमा के दिन निर्मल भाव से धूप-दीप से पूजन कर उखाड़ें और घर में लाकर गाय के दूध से धो कर रख दें। इस जड़ का एक भाग अपने पास रखने से सारे कार्य सिद्ध होते हैं। मान-सम्मान में वृद्धि होती है।

 

सुदर्शन की जड़:-

करे सौदर्शनं बध्वा राजप्रियो भवेत्।

सिंही मूले हरेत्पुष्ये कटि बध्वा नृपप्रिय:।

हाथ में सुदर्शन की जड़ बांधें। तो राजा प्रिय होता है अथवा कांकरासिंही की जड़ पुष्य नक्षत्र में लाकर कमर में बाँधें तो राजा (मंत्री, अधिकारी) वश में होता है अथवा राजा का प्रिय हो जाता है।


सिद्धि देने वाली जड़ी-बूटी : गुलतुरा (दिव्यता के लिए), तापसद्रुम (भूतादि ग्रह निवारक), शल (दरिद्रता नाशक), भोजपत्र (ग्रह बाधाएं निवारक), विष्णुकांता (शस्त्रु नाशक), मंगल्य (तांत्रिक क्रिया नाशक), गुल्बास (दिव्यता प्रदानकर्ता), जिवक (ऐश्वर्यदायिनी), गोरोचन (वशीकरण), गुग्गल (चामंडु सिद्धि), अगस्त (पितृदोष नाशक), अपमार्ग (बाजीकरण)।

बांदा (चुम्बकीय शक्ति प्रदाता), श्‍वेत और काली गुंजा (भूत पिशाच नाशक), उटकटारी (राजयोग दाता), मयूर शिका (दुष्टात्मा नाशक) और काली हल्दी (तांत्रिक प्रयोग हेतु) आदि ऐसी अनेक जड़ी-बूटियां हैं, जो व्यक्ति के सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन को साधने में महत्वपूर्ण मानी गई हैं।


आचार्य मनोज तिवारी
सहसेपुर खमरिया भदोही
9005618107

रविवार, 22 नवंबर 2020

लक्ष्मी जी का निवास स्थान

दरिद्रा कहां रहती हैं लक्ष्मी जी व उनकी बड़ी बहन दरिद्रा की कथा ।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।(श्रीसूक्त ८)

लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन–क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।

जगत्पति भगवान विष्णु ने जगत को दो प्रकार का बनाया है। भगवान विष्णु ने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्म, श्री तथा पद्मा लक्ष्मी की उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेद विरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्म का निर्माण करके दूसरा भाग बनाया।

अलक्ष्मी (ज्येष्ठा, दरिद्रा) तथा लक्ष्मी का प्रादुर्भाव

समस्त देवताओं व राक्षसों ने मन्दराचल पर्वत को मथानी, कच्छप को आधार और शेषनाग को मथानी की रस्सी बनाकर समुद्रमन्थन किया। उसके परिणामस्वरूप क्षीरसागर से सबसे पहले भयंकर ज्वालाओं से युक्त कालकूट विष निकला जिसके प्रभाव से तीनों लोक जलने लगे। भगवान विष्णु ने लोककल्याण के लिए शिव जी से प्रार्थना की और शिव जी ने हलाहल विष को कण्ठ में धारण कर लिया। पुन: समुद्र-मंथन होने पर कामधेनु, उच्चै:श्रवा नामक अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ नामक पद्मरागमणि, कल्पवृक्ष, व अप्सराएं प्रकट हुईं। फिर लक्ष्मी जी प्रकट हुई। उसके बाद वारुणी देवी (मदिरा), चन्द्रमा, पारिजात, पांचजन्य शंख, तदनन्तर समुद्र-मंथन से हाथ में अमृत का कलश लिए धन्वतरि प्रकट हुए।

श्री लिंग महापुराण के अनुसार समुद्र मंथन में महाभयंकर विष निकलने के बाद ज्येष्ठा अशुभ लक्ष्मी उत्पन्न हुईं फिर विष्णुपत्नी पद्मा लक्ष्मी प्रकट हुईं। लक्ष्मी जी से पहले प्रादुर्भूत होने के कारण अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयीं हैं।

अलक्ष्मी (दरिद्रा, ज्येष्ठा देवी)

ततो ज्येष्ठा समुत्पन्ना काषायाम्बरधारिणी।
पिंगकेशा रक्तनेत्रा कूष्माण्डसदृशस्तनी।।
अतिवृद्धा दन्तहीना ललज्जिह्वा घटोदरी।
यां दृष्ट्वैव च लोकोऽयं समुद्विग्न: प्रजायते।।

समुद्रमंथन से काषायवस्त्रधारिणी, पिंगल केशवाली, लाल नेत्रों वाली, कूष्माण्ड के समान स्तनवाली, अत्यन्त बूढ़ी, दन्तहीन तथा चंचल जिह्वा को बाहर निकाले हुए, घट के समान पेट वाली एक ऐसी ज्येष्ठा नाम वाली देवी उत्पन्न हुईं, जिन्हें देखकर सारा संसार घबरा गया।

क्षीरोदतनया, पद्मा लक्ष्मी

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी।
गम्भीरावर्तनाभिस्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।।
या लक्ष्मीर्दिव्यरूपैर्मणिगणखचितै: स्नापिता हेमकुम्भै:।
सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता।।

उसके बाद तिरछे नेत्रों वाली, सुन्दरता की खान, पतली कमर वाली, सुवर्ण के समान रंग वाली, क्षीरसमुद्र के समान श्वेत साड़ी पहने हुए तथा दोनों हाथों में कमल की माला लिए, खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान, भगवान की नित्य शक्ति ‘क्षीरोदतनया’ लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। उनके सौन्दर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा देखकर देवता और दैत्य दोनों ही मोहित हो गए।

नम: कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नम:।
कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्म्यै नमो नम:।।
पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नम:।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:।।

लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु के साथ अपने विवाह से पहले कहा कि बड़ी बहन का विवाह हुए बिना छोटी बहन का विवाह शास्त्रसम्मत नहीं है। तब भगवान विष्णु ने दु:सह ऋषि को समझा-बुझाकर ज्येष्ठा से विवाह करने के लिए मना लिया। कार्तिकमास की द्वादशी तिथि को पिता समुद्र ने दरिद्रा देवी का कन्यादान कर दिया। विवाह के बाद दु:सह ऋषि जब दरिद्रा को लेकर अपने आश्रम पर आए तो उनके आश्रम में वेदमन्त्र गुंजायमान हो रहे थे। वहां से ज्येष्ठा दोनों कान बंद कर भागने लगी। यह देखकर दु:सह मुनि उद्विग्न हो गये क्योंकि उन दिनों सब जगह धर्म की चर्चा और पुण्यकार्य हुआ करते थे। सब जगह वेदमन्त्रों और भगवान के गुणगान से बचकर भागते-भागते दरिद्रा थक गई। तब दरिद्रा ने मुनि से कहा–’जहां वेदध्वनि, अतिथि-सत्कार, यज्ञ-दान, भस्म लगाए लोग आदि हों, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता। अत: आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिए जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो।’

दु:सह मुनि उसे निर्जन वन में ले गए। वन में दु:सह मुनि को मार्कण्डेय ऋषि मिले। दु:सह मुनि ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि ‘इस भार्या के साथ मैं कहां रहूं और कहां न रहूं?’

दरिद्रा के प्रवेश करने के स्थान

मार्कण्डेय ऋषि ने दु:सह मुनि से कहा– जिसके यहां शिवलिंग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहां जप आदि न होते हों बल्कि रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर घुस जाना।

लिंगार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्।
रुद्रभक्तिर्विनिन्दा च तत्रैव विश निर्भय:।।

जहां पति-पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों,  घर में रात्रि के समय लोग झगड़ा करते हों,  जो लोग बच्चों को न देकर स्वयं भोज्य पदार्थ खा लेते हों,  जो स्नान नहीं करते, दांत-मुख साफ नहीं करते,  गंदे कपड़े पहनते, संध्याकाल में सोते व खाते हों,  जुआ खेलते हों,  ब्राह्मण के धन का हरण करते हों, परायी स्त्री से सम्बन्ध रखते हों,  हाथ-पैर न धोते हों, उस घर में तुम दोनों घुस जाओ।

दरिद्रा से बचने के लिए घरों में न लगाये जाने वाले वृक्ष

जिस घर में  कांटेदार, दूधवाले, पलाश के व निम्ब के वृक्ष हों,  सेम की लता हो,  दोपहरिया, तगर तथा अपराजिता के फूल का पेड़ हो, वे घर तुम दोनों के रहने के योग्य है। जिस घर में जटामांसी, बहुला, अजमोदा, केला, ताड़, तमाल, भिलाव, इमली, कदम्ब, खैर, बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा कटहल के पेड़ हों वहां तुम दरिद्रा के साथ घुस जाया करो। जिस घर में व बगीचे में कौवों का निवास हो उसके यहां तुम पत्नी सहित निवास करो। जिस घर में प्रेतरूपा काली प्रतिमा व भैरव-मूर्ति हो, वहां तुम पत्नी सहित निवास करो।

दरिद्रा के प्रवेश न करने के स्थान

मार्कण्डेय जी ने दु:सह मुनि को  कहा– जहां नारायण व रुद्र के भक्त हों, भस्म लगाने वाले लोग हों,  भगवान का कीर्तन होता हो,  घर में भगवान की मूर्ति व गाएं हों उस घर में तुम दोनों मत घुसना।  जो लोग नित्य वेदाभ्यास में संलग्न हों,  नित्यकर्म में तत्पर हों तथा वासुदेव की पूजा में रत हों, उन्हें दूर से ही त्याग देना–

वेदाभ्यासरता नित्यं नित्यकर्मपरायणा:।
वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान् विसर्जयेत्।।

तथा  जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तों की नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना।

यह कहकर मार्कण्डेय ऋषि चले गए। तब दु:सह मुनि ने दरिद्रा को एक पीपल के मूल में बिठाकर कहा कि मैं तुम्हारे लिए रसातल जाकर उपयुक्त आवास की खोज करता हूँ। दरिद्रा ने कहा–’तब तक मैं खाऊंगी क्या?’ मुनि ने कहा–’तुम्हें प्रवेश के स्थान तो मालूम हैं, वहां घुसकर खा-पी लेना। लेकिन जो स्त्री तुम्हारी पुष्प व धूप से पूजा करती हो, उसके घर में मत घुसना।’

यह कहकर मुनि बिल मार्ग से रसातल में चले गए। लेकिन बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई स्थान नहीं मिला। कई दिनों तक पीपल के मूल में बैठी रहने से भूख-प्यास से व्याकुल होकर दरिद्रा रोने लगीं। उनके रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। उनके रोने की आवाज को जब उनकी छोटी बहन लक्ष्मीजी ने सुना तो वे भगवान विष्णु के साथ उनसे मिलने आईं। दरिद्रा ने भगवान विष्णु से कहा–’मेरे पति रसातल में चले गए है, मैं अनाथ हो गई हूँ, मेरी जीविका का प्रबन्ध कर दीजिए।’

भगवान विष्णु ने कहा ’हे दरिद्रे! जो माता पार्वती, शंकरजी व मेरे भक्तों की निन्दा करते हैं; शंकरजी की निन्दा कर मेरी पूजा करते हैं, उनके धन पर तुम्हारा अधिकार है। तुम सदा पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के मूल में निवास करो। तुमसे मिलने के लिए मैं लक्ष्मी के साथ प्रत्येक शनिवार को यहां आऊंगा और उस दिन जो अश्वत्थ वृक्ष का पूजन करेगा, मैं उसके घर लक्ष्मी के साथ निवास करुंगा।’ उस दिन से दरिद्रादेवी पीपल के नीचे निवास करने लगीं। रविवार को अश्वत्थ/पीपल वृक्ष की पूजा नहीं करनी चाहिए।

देवताओं द्वारा दरिद्रा को दिए गए निवासयोग्य स्थान

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में बताया गया है– जिसके घर में सदा कलह होता हो, जो झूठ और कड़वे वचन बोलते हैं,  जो मलिन बुद्धि वाले हैं व संध्या के समय सोते व भोजन करते हैं, बहुत भोजन करते हैं, मद्यपान में लगे रहते हैं, बिना पैर धोये जो आचमन या भोजन करते हैं,  बालू, नमक या कोयले से दांत साफ करते हैं, जिनके घर में कपाल, हड्डी, केश व भूसी की आग जलती हो, जो छत्राक (कुकुरमुत्ता) तथा सड़ा हुआ बेल खाते हैं,  जहां गुरु, देवता, पितर और अतिथियों का पूजन तथा यज्ञदान न होता हो, ब्राह्मण, सज्जन व वृद्धों की पूजा न होती हो, जहां द्यूतक्रीडा होती हो, जो दूसरों के धन व स्त्री का अपहरण करते हों, वहां अशुभ दरिद्रे तुम सदा निवास करना।

स्वयं लक्ष्मी जी द्वारा रुक्मिणी जी को बताये गए अपने निवासस्थान

दीपावली की रात्रि में विष्णुप्रिया लक्ष्मी गृहस्थों के घरों में विचरण कर यह देखती हैं कि हमारे निवास-योग्य घर कौन-कौन से हैं? महाभारत के अनुशासनपर्व में रुक्मिणीजी के पूछने पर कि हे देवि! आप किन-किन पर कृपा करती हैं, स्वयं लक्ष्मीजी कहती हैं–आमलक फल (आंवला), गोमय, शंख, श्वेत वस्त्र, चन्द्र, सवारी, कन्या, आभूषण, यज्ञ, जल से पूर्ण मेघ, फूले हुए कमल, शरद् ऋतु के नक्षत्र, हाथी, गायों के रहने के स्थान, उत्सव मन्दिर, आसन, खिले हुए कमलों से सुशोभित तालाब, मतवाले हाथी, सांड, राजा, सिंहासन, सज्जन पुरुष, विद्वान ब्राह्मण, प्रजापालक क्षत्रिय, खेती करने वाले वैश्य तथा सेवापरायण शूद्र मेरे प्रधान निवासस्थान हैं।
लक्ष्मीजी ने देवराज इन्द्र को बताया कि–भूमि (वित्त), जल (तीर्थादि), अग्नि (यज्ञादि) एवं विद्या (ज्ञान)–ये चार स्थान मुझे प्रिय हैं। सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम एवं धर्म जहां वास करते हैं, वहां मेरा निवास रहता है।

जिस स्थान पर श्रीहरि, श्रीकृष्ण की चर्चा होती है,  जहां तुलसी शालिग्राम की पूजा, शिवलिंग व दुर्गा का आराधन होता है वहां पद्ममुखी लक्ष्मी सदा विराजमान रहती हैं।

‘मैं उन पुरुषों के घरों में निवास करती हूँ  जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, सच्चरित्र, कर्तव्यपरायण, अक्रोधी, भक्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, सदाचरण में लीन व गुरुसेवा में निरत रहते हैं।

इसी प्रकार उन स्त्रियों के घर मुझे प्रिय हैं जो क्षमाशील, शीलवती, सौभाग्यवती, गुणवती, पतिपरायणा, सद्गुणसम्पन्ना होती हैं व जिन्हें देखकर सबका चित्त प्रसन्न हो जाता है, जो देवताओं, गौओं तथा ब्राह्मणों की सेवा में तत्पर रहती हैं तथा घर में धान्य के संग्रह में तत्पर रहती हैं।

लक्ष्मीजी किन लोगों के घरों को छोड़कर चली जाती हैं।

लक्ष्मीजी ने देवराज इन्द्र से कहा– जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर, गुरुजनों के दोष देखने वाला है, बात-बात में खिन्न हो उठते हैं, जो मन में दूसरा भाव रखते हैं और ऊपर से कुछ और दिखाते हैं, ऐसे मनुष्यों में मैं निवास नहीं करती। जो नखों से भूमि को कुरेदता और तृण तोड़ता है, सिर पर तेल लगाकर उसी हाथ से दूसरे अंग का स्पर्श करता है,  अपने किसी अंग को बाजे की तरह बजाता है, निरन्तर बोलता रहता है, जो भगवान के नाम का व अपनी कन्या का विक्रय करता है, जहां बालकों के देखते रहने पर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हैं, जिसके यहां अतिथि को भोजन नहीं कराया जाता, ब्राह्मणों से द्वेषभाव रखता है,  दिन में शयन करता है, उसके घर से लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती है।

वे स्त्रियां भी लक्ष्मीजी को प्रिय नहीं हैं जो अपवित्र, चटोरी, निर्लज्ज, अधीर, झगड़ालू व अधिक सोती हैं, जो अपनी गृहस्थी के सामानों की चिन्ता नहीं करतीं, बिना सोचे-बिचारे काम करती हैं, पति के प्रतिकूल बोलती हैं और  दूसरों के घरों में घूमने-फिरनें में आसक्ति रखती हैं, घर की मान-मर्यादा को भंग करने वाली हैं, जो स्त्रियां देहशुद्धि से रहित व सभी (भक्ष्याभक्ष्य) पदार्थों को खाने के लिए तत्पर रहती हों–उन्हें मैं त्याग देती हूँ।

इन दुर्गुणों के होने पर भले ही कितनी ही लक्ष्मी-पूजा की जाए, उनके घर में लक्ष्मीजी का निवास नहीं हो सकता।

लक्ष्मीजी द्वारा असुरराज बलि और प्रह्लाद का त्याग

महाभारत के शान्तिपर्व में कथा है कि एक बार असुरराज प्रह्लाद ने एक ब्राह्मण को अपना शील प्रदान कर दिया, इस कारण उनका तेज, धर्म, सत्य, व्रत और अंत में लक्ष्मी भी साथ छोड़कर चली गयीं। प्रह्लादजी की प्रार्थना पर लक्ष्मीजी ने उन्हें दर्शन देकर कहा–’शील और चारित्र्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं, इसी कारण शीलवान व्यक्ति के यहां रहना मुझे अच्छा लगता है। जिसके पास शील नहीं है, वहां मेरा नहीं, अपितु दरिद्रा का निवास होता है।’

एक बार दानवीर बलि को भी लक्ष्मीजी ने इसलिए त्याग दिया कि उन्होंने उच्छिष्टभक्षण किया था और देवताओं व ब्राह्मणों का विरोध किया था।

अतएव मानव को अपना घर ऐसा बनाना चाहिए जो लक्ष्मीजी के मनोनुकूल हो और जहां पहुंचकर वे किसी अन्य जगह जाने का विचार मन में न लावें। साथ ही लक्ष्मी प्राप्ति मनुष्य के उत्कृष्ट पुरुषार्थ पर भी निर्भर है क्योंकि कहा गया है–

‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी:’।

सोमवार, 10 अगस्त 2020

बजरंग बाण से सिद्ध चमत्कारी उपाय

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पवनपुत्र और श्रीराम के परम सेवक हनुमान जी से अगर कोई वरदान पाना हो तो आपको इसके लिए सबसे पहले श्रीराम का नाम लेना होगा। अगर इतने से भी काम न बने तो आप हनुमान जी को श्रीराम के नाम की सौगंध दे दीजिये। बस फिर देखिये की कैसे नहीं बनते आपके बिगड़े काम। आपके जीवन की 8 ऐसी समस्याओं की जिनका समाधान सिर्फ और सिर्फ बजरंगबाण के पास ही है। बस इसके लिए आपको अलग-अलग तरीके से बजरंगबाण का पाठ करना होगा।     
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1)― बजरंगबाण से विवाह बाधा खत्म―
कदली वन, या कदली वृक्ष के नीचे बजरंग बाण का पाठ करने से विवाह की बाधा खत्म हो जाती है। यहां तक कि तलाक जैसे कुयोग भी टलते हैं बजरंग बाण के पाठ से।
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2)― बजरंग बाण से ग्रहदोष समाप्त― अगर किसी प्रकार के ग्रहदोष से पीड़ित हों, तो प्रात:काल बजरंग बाण का पाठ, आटे के दीप में लाल बत्ती जलाकर करें। ऐसा करने से बड़े से बड़ा ग्रह दोष पल भर में टल जायेगा।
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3)― साढ़ेसाती-राहु से नुकसान की भरपाई― अगर शनि, राहु, केतु जैसे क्रूर ग्रहों की दशा, महादशा चल रही हो तो उड़द दाल के 21 या 51 बड़े एक धागे में माला बनाकर चढ़ायें। सारे बड़े प्रसाद के रुप में बांट दें। आपको तिल के तेल का दीपक जलाकर सिर्फ 3 बार बजरंगबाण का पाठ करना होगा।
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4)― बजरंगबाण से कारागार से मुक्ति― अगर किसी कारणवश जेल जाने के योग बन रहे हों, या फिर कोई संबंधी जेल में बंद हो तो उसे मुक्त कराने के लिए हनुमान जी की पूंछ पर सिंदूर से 11 टीका लगाकर 11 बार बजरंग बाण पढ़ने से कारागार योग से मुक्ति मिल जाती है। अगर आप हनुमान जी को 11 गुलाब चढ़ाते हैं या फिर चमेली के तेल में 11 लाल बत्ती के दीपक जलाते हैं तो बड़े से बड़े कोर्ट केस में भी आपको जीत मिल जायेगी।
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5)― सर्जरी और गंभीर बीमारी टाले बजरंग बाण― कई बार पेट की गंभीर बीमारी जैसे लीवर में खराबी, पेट में अल्सर या कैंसर जैसे रोग हो जाते हैं, ऐसे रोग अशुभ मंगल की वजह से होते हैं। अगर इस तरह के रोग से मुक्ति पानी हो तो हनुमान जी को 21 पान के पत्ते की माला चढ़ाते हुए 5 बार बजरंग बाण पढ़ना चाहिये। ध्यान रहे कि बजरंगबाण का पाठ राहुकाल में ही करें। पाठ के समय घी का दीप ज़रुर जलायें।
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6)― छूटी नौकरी दोबारा दिलाए बजरंग बाण― अगर नौकरी छूटने का डर हो या छूटी हुई नौकरी दोबारा पानी हो तो बजरंगबाण का पाठ रात में नक्षत्र दर्शन करने के बाद करें। इसके लिए आपको मंगलवार का व्रत भी रखना होगा। अगर आप हनुमान जी को नारियल चढ़ाने के बाद, उसे लाल कपड़े में लपेट कर घर के आग्नेय कोण रखते हैं तो मालिक स्वयं आपको नौकरी देने आ सकता है।
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7)― वास्तुदोष दूर करे बजरंगबाण― कई बार घर में वास्तुदोष के चलते कई समस्या हो जाती है। तो घर में वास्तुदोष दूर करने के लिए 3 बार बजरंगबाण का  पाठ करना चाहिए। हनुमान जी को लाल झंडा चढ़ाने के बाद उसे घर के दक्षिण दिशा में लगाने से भी वास्तुदोष से मुक्ति मिलती है। घर में सकारात्मक ऊर्जा के लिए पंचमुखी हनुमान की प्रतिमा घर के मुख्य द्वार पर लगायें।
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8)― बजरंग बाण से दवा असर करे― कई बार गंभीर बीमारी में दवा फायदा नहीं करती। दवा फायदा करे इसके लिए 2 बार बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए। साथ ही साथ संजीवनी पर्वत की रंगोली बनाकर उस पर तुलती के 11 दल चढ़ाने से दवा धीरे धीरे असर करने  लगती है।
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रात्रि में बजरंग बाण पाठ करने की विधि―
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आज के समय में हर मनुष्य किसी न किसी परेशानी से घिरा हुआ है। हर समाधान के बाद भी उसे कोई हल नही मिलता। पूजा-पाठ करने के बाद भी अभिष्ठ फल की प्राप्ति नही हो पाती है। पूजा-पाठ की भी एक विधि होती है अगर पूजा-पाठ विधि अनुसार नही की जाती है तो उसका फल आपको मिलता तो है किन्तु बहुत प्रयत्न के बाद मिलता है।
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आज हम आपको हनुमान जी के बजरंग बाण के रात्रि में किये जाने वाले पाठ के विषय में बता रहे है। वैसे तो बजरंग बाण का नियमित रूप से पाठ आपको हर संकट से दूर रखता है। किन्तु अगर रात्रि में बजरंग बाण को इस प्रकार से सिद्ध किया जाये तो इसके चमत्कारी प्रभाव तुरंत ही आपके सामने आने लगते है। अगर आप चाहते है अपने शत्रु को परास्त करना या फिर व्यापर में उन्नति या किसी भी प्रकार के अटके हुए कार्य में पूर्णता तो रात्रि में बजरंग बाण पाठ को अवश्य करें।
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विधि इस प्रकार है―
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किसी भी मंगलवार को रात्रि का 11 से रात्रि 1 बजे तक का समय सुनिश्चित कर ले। बजरंग बाण का पाठ आपको 11 से रात्रि 1 तक करना है। सबसे पहले आप एक चौकी को पूर्व दिशा की तरफ स्थापित करें अब इस चौकी पर एक पीला कपडा बिछा दे। अब आप इस मंत्र को एक कागज पर लिख कर इसे फोल्ड करके इस चौकी पर रख दे। मंत्र इस प्रकार है―
“ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्”
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अब आप चौकी के दायें तरफ एक मिटटी के दिए में घी का दीपक जला दे। आपको इस चौकी के सामने आसन पर बैठ जाना है। इस प्रकार आपका मुख पूर्व दिशा कर तरफ हो जायेगा और दीपक आपके बाएं तरफ होगा। अब आप परमपिता परमेश्वर का ध्यान करते हुए इस प्रकार बोले― हे परमपिता परमेश्वर मै (अपना नाम बोले) गोत्र (अपना गोत्र बोले) आपकी कृपा से बजरंग बाण का यह पाठ कर रहा हु इसमें मुझे पूर्णता प्रदान करें। अब आप ठीक 11 बजते ही इस मंत्र का जाप शुरू कर दे “ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्” इस मंत्र को आप 5 मिनट तक जाप करें, ध्यान रहे मंत्र में जहाँ पर फट शब्द आता है वहा आप फट बोलने के साथ-साथ  2 उँगलियों से दुसरे हाथ की हथेली पर ताली बजानी है।
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अब आप 11 बजकर 5 मिनट से और रात्रि 1 बजे तक लगातार बजरंग बाण का पाठ करना प्रारंभ कर दे। ध्यान रहे बजरंग बाण पाठ आपको याद होना चाहिए। किताब से पढ़कर बिलकुल न करें।  जैसे ही 1 बजता है आप बजरंग बाण के पाठ को पूरा कर अब आप फिर से इस मंत्र “ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्” का जाप 5 मिनट तक करें। अब आप कागज पर लिखे हुए मंत्र को जला दे। इस प्रकार आपका यह बजरंग बाण का पाठ एक ही रात्रि में सिद्ध हो जाता है।
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इस प्रकार सिद्ध किया गया यह बजरंग बाण पाठ आपके जीवन में चमत्कारिक प्रभाव दिखता है।
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―बजरंग बाण का पाठ―
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जय श्री राम
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।। दोहा ।।
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निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करे सन्मान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान।।
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।। चौपाई ।।
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जय हनुमन्त सन्त हितकारी।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।।१।।
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जन के काज विलम्ब न कीजै।
आतुर दौरि महा सुख दीजै।।२।।
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जैसे कूदि सिन्धु के पारा।
सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।३।।
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आगे जाई लंकिनी रोका।
मारेहु लात गई सुर लोका।।४।।
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जाय विभीषण को सुख दीन्हा।
सीता निरखि परम पद लीन्हा।।५।।
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बाग उजारि सिन्धु महं बोरा।
अति आतुर जमकातर तोरा।।६।।
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अक्षय कुमार मारि संहारा।
लूम लपेट लंक को जारा।।७।।
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लाह समान लंक जरि गई।
जय जय धुनि सुरपुर में भई।।८।।
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अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।
कृपा करहु उर अन्तर्यामी।।९।।
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जय जय लखन प्राण के दाता।
आतुर होय दुःख हरहु निपाता।।१०।।
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जय गिरिधर जय जय सुखसागर।
सुर समूह समरथ भटनागर।।११।।
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ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।
बैरिहि मारु बज्र की कीले।।१२।।
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गदा बज्र लै बैरिहि मारो।
महाराज निज दास उबारो।।१३।।
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सुनि पुकार हुंकार देय धावो।
बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।।१४।।
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ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा।।१५।।
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सत्य होहु हरि शपथ पाय के।
रामदूत धरु मारु जाय के।।१६।।
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जय जय जय हनुमन्त अगाधा।
दुःख पावत जन केहि अपराधा।।१७।।
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पूजा जप तप नेम अचारा।
नहिं जानत हौं दास तुम्हारा।।१८।।
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वन उपवन, मग गिरि गृह माहीं।
तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।१९।।
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पांय परों कर जोरि मनावौं।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।२०।।
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जय अंजनि कुमार बलवन्ता।
शंकर सुवन बीर हनुमन्ता।।२१।।
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बदन कराल काल कुल घालक।
राम सहाय सदा प्रति पालक।।२२।।
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भूत प्रेत पिशाच निशाचर।
अग्नि बेताल काल मारी मर।।२३।।
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इन्हें मारु तोहि शपथ राम की।
राखु नाथ मरजाद नाम की।।२४।।
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जनकसुता हरि दास कहावो।
ताकी शपथ विलम्ब न लावो।।२५।।
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जय जय जय धुनि होत अकाशा।
सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा।।२६।।
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चरण पकर, कर जोरि मनावौं।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।२७।।
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उठु उठु उठु चलु राम दुहाई।
पांय परों, कर जोरि मनाई।।२८।।
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ॐ चं चं चं चं चं चपल चलन्ता।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।।२९।।
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ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल।
ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।३०।।
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अपने जन को तुरत उबारो।
सुमिरत होय आनन्द हमारो।।३१।।
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ताते बिनती करौं पुकारी।
हरहु सकल दुःख विपत्ति हमारी।।३२।।
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परम प्रबल प्रभाव प्रभु तोरा।
कस न हरहु अब संकट मोरा।।३३।।
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हे बजरंग ! बाण सम धावौ।
मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।३४।।
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हे कपिराज काज कब ऐहौ।
अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।३५।।
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जन की लाज जात एहि बारा।
धावहु हे कपि पवन कुमारा।।३६।।
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जयति जयति जय जय हनुमाना।
जयति जयति गुन ज्ञान निधाना।।३७।।
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जयति जयति जय जय कपि राई।
जयति जयति जय जय सुख दाई।।३८।।
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जयति जयति जय, राम पियारे।
जयति जयति जय, सिया दुलारे।।३९।।
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जयति जयति मुद मंगल दाता।
जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।४०।।
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एहि प्रकार गावत गुण शेषा।
पावत पार नहीं लव लेसा।।४१।।
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राम रूप सर्वत्र समाना।
देखत रहत सदा हर्षाना।।४२।।
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विधि सारदा सहित दिन राती।
गावत कपि के गुन बहु भांती।।४३।।
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तुम सम नहीं जगत में बलवाना।
करि विचार देखउं विधि नाना।।४४।।
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यह जिय जानि सरन हम आये।
ताते विनय करौं मन लाये।।४५।।
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सुनि कपि आरत बचन हमारे।
हरहु सकल दुःख सोच हमारे।।४६।।
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एहि प्रकार विनती कपि केरी।
जो जन करै, लहै सुख ढेरी।।४७।।
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याके पढ़त बीर हनुमाना।
धावत बान तुल्य बलवाना।।४८।।
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मेटत आय दुःख छिन माहीं।
दै दर्शन रघुपति ढिंग जाहीं।।४९।।
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डीठ मूठ टोनादिक नासै।
पर कृत यन्त्र मन्त्र नहिं त्रासै।।५०।।
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भैरवादि सुर करै मिताई।
आयसु मानि करै सेवकाई।।५१।।
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आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै।
ताकी छांह काल नहिं व्यापै।।५२।।
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शत्रु समूह मिटै सब आपै।
देखत ताहि सुरासुर कांपै।।५३।।
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तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई।
रहै सदा कपिराज सहाई।।५४।।
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यह बजरंग बाण जेहि मारै।
ताहि कहो फिर कौन उबारै।।५५।
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पाठ करै बजरंग बाण की।
हनुमत रक्षा करै प्राण की।।५६।।
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यह बजरंग बाण जो जापै।
ताते भूत प्रेत सब कांपै।।५७।।
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धूप देय अरु जपै हमेशा।
ताके तन नहिं रहै कलेशा।।५८।।
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।। दोहा ।।
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उर प्रतीति दृढ सरन हवै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करै सब काज सफल हनुमान।।
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान।।
जय श्री राम🌹

आचार्य मनोज तिवारी
सहसेपुर खमरिया भदोही